मध्यप्रदेश के बैगा जनजाति द्वारा उपयोगी महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण: बाधंवगढ़ के संदर्भ में
स्कंद मिश्रा
वनस्पति विभाग, शासकीय नवीन विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail: skandbt@gmail.com
ABSTRACT:
बांधवगढ़ मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में 20॰36‘ से 23॰42‘ उŸारी अक्षांश एवं 80॰57‘ से 81॰6‘ पूर्वी देशांतर के बीच विन्ध्याचल की कणष्मीय चट्टानों पर छोटी-बड़ी 32 पहाड़ियों से घिरा नर्मदा नदी के उŸार एवं सोन नदी के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से बैगा, कोल, गोड़, पनिका, खैरवार आदि जनजातियां निवास करती हैं। बांधवगढ़ का वन नम उष्ण डेसीडुअस प्रकार का है। प्रस्तुत शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र के बैगा जनजाति द्वारा औषधि के रूप में उपयोग किये जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण पुष्पीय पौधों और उनके अंगों की जानकारीयां एवं उनके संरक्षण के संबन्ध में विचार दिये जाते हैं। सामान्य बीमारियों जैसे दर्द, बुखार, घाव, सर्दी, खांसी, दस्त, सूजन आदि रोगों के उपचार के लिए अनेक पौधे बैगा जनजाति द्वारा उपयोग में लाये जाते हैं। लेकिन कुछ महत्वपूर्ण बीमारियों के उपचार हेतु कुछ पौधों का ही उपयोग किया जाता है। जैसे - गर्भपात हेतु घुंघची/रती (एब्रस प्रिकैटोरिअस), तपेदिक हेतु बज्रदन्ती (बाउलेरिया प्रिओनिटिस), बवासीर हेतु ब्लूमिया (ब्लूमिया लैसेरा), कुष्ठ रोग हेतु चिरचिरा (एकाइरेन्थस एसपेरा), कैन्सर हेतु सफेद अरन्ड (जैट्रोफा क्यूरकस), सर्पदंश हेतु दुधबेल (परगुलेरिया डैइमिया), डाइबिटीज हेतु बीजा (टेरोकापस मारसूपियम), कान के दर्द हेतु रमतिला (गूइजोटिया एबीसिनिका), सिफलिस एवं गोनोरिया हेतु सेमल (बाम्बबैक्स सीबा) आदि। इनमें से बहुत से पौधे अत्याधिक उपयोग के कारण इस प्राकृतिक स्त्रोत से धीरे-धीरे कम हो रहे हैं या समाप्त हो रहे हैं। इसलिये आवश्यक है कि इन क्षेत्रों में ऐसे पौधों का रोपण किया जाय जिससेे कि जनजातियां एवं जनसामान्य के उपयोग हेतु औषधि मिल सके। इन पौधे के जर्मप्लाज्म का परिरक्षित करना, पौधों के अंगों का रासायनिक विश्लेषण करके विभिन्न अंगों का रोगों के प्रति दक्षता का पता लगाना तथा महत्वपूर्ण पौधों का संरक्षण करना अन्य आवश्यक पहलू हैं।
परिचय
प्राचीन काल से ही भारत में विभिन्न प्रकार के पौधों का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। हर्षबरगर (1895) ने पौधों एवं आदिवासियों के संबन्धों के अध्ययन को इथनोबाॅटनी कहा। विभिन्न प्रकार के रोगों से छुटकारा पाने के लिए जनजातियों एवं ग्रामीण जन आज भी जड़ी बूटियों का उपयोग करते हैं। बांधवगढ़ मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में सोन नदी के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से बैगा, कोल गोड़ आदि जनजातियां पाई जाती है। बांधवगढ़ का वन आर्द्र उष्ण डेसीडुअस प्रकार का है। यहां निवास करने वाली बैगा जनजाति विभिन्न रोगों के उपचार हेतु पौधों एवं उनके अंगों का उपयोग करती हैं। इनमें से अनेक रोगों हेतु बहुत से पौधे औषधि में उपयोग करते हैं, लेकिन कुल महत्वपुर्ण रोगों हेतु कुछ विशेष पौधों की ही जानकारी है। मध्यप्रदेश में बैगा जनजाति के इथनोबाॅटनी के संबन्ध में कुछ ही अध्ययन ही किया गया है इनमें इल्विन (1986) ब्रिजलाल (1988) पटेल,(1981) ब्रिजलाल (1993)शुक्ला, एण्ड ब्रिजलाल (1991) मिश्रा.तिवारी दुबे एण्ड चटर्जी (1993) तिवारी, एव मिश्रा (1994) मिश्रा, साहू, मिश्रा एवं सिंह (2014) (2015) मिश्रा, (2015) सिंह,्र आदि है। लेकिन बांधवगढ़ क्षेत्र के बैगा में अभी तक अध्ययन नही हुआ है।
विधि
बांधवगढ़ के बैगा आदिवासियों द्वारा उपयोग किये जाने वाले औषधिय पौधों की जानकारी प्राप्त करने हेतु क्षेत्र के 10 बैगा गांवों के 40 से 70 वर्ष के बैगा स्त्री, पुरूषों एवं वैद्यों से पुंछताछ की गई तथा उपयोगी पौधों, उनके अंगों, उपयोग विधि, पौधों के स्वाभाव, स्थानीय नाम की जानकारी डायरी में नोट किया गया। प्राप्त जानकारियों का तुलानात्मक अध्ययन किया गया तथा उपयोगी पौधों एवं अंगों को एकत्रित करके स्थानीय फ्लोरा से उनकी पहचान की गई। कुछ पौधों की पहचान एस.एफ.आर.आई. जबलपुर से कराई गयी। पौधों का हरबेरियम बनाकर शासकीय नवीन विज्ञान महाविद्यालय, रीवा में रखा गया है।
तालिका - 1: बैगा जनजाति द्वारा विभिन्न रोगों के उपचार हेतु प्रयोग किये जाने वाले पौधों की संख्या।
औषधीय पौधों की संख्या रोगों के नाम
एक या दो पौधे
(प्रत्येक रोग हेतु) गर्भपात, बन्धता, तपेदिक, कैन्सर, सर्पदंश, कुष्ठ रोग डाइबिटीज, कान का दर्द, बवासीर सिफलिस, गोनोरिया, रक्त चाप एवं लैंगिक कमजोरी।
4 से 10 पौधे
(प्रत्येक रोग हेतु) त्वचा रोग, दस्त, पेचिश, सूजन, सर्दी, खांसी, बुखार, दर्द, पीलिया घाव, चोट आदि।
तालिका - 2: बैगा जनजाति द्वारा उपयोग किये जाने वाले महत्वपूर्ण रोगों के उपचार हेतु औषधीय पौधे एवं उनके अंग।
क्र. रोग पौधे का नाम स्थानीय नाम कुल उपयोगी अंग
1 गर्भपात एब्रस प्रिकैटोरिअस घुंघची/रत्ती फैबेसी जड़
2 बन्धता एब्रस प्रिकैटोरिअस घुंघची/रत्ती फैबेसी बीज
3 तपेदिक बरलेरिया प्रिओनिटिस बज्रदन्ती एकेन्थेसी पत्ती, बीज
4 कैन्सर जैट्रोफा क्यूरकस सफेद अरंड यूफाॅरबिएसी लैटेक्स
5 सर्पदंश परगुलैरिया डैइमिया दूधीबेल एस्क्लेपिएडेसी पत्ती
6 कुष्ठ रोग एकाइरेन्थेस एसपेरा,
नाइजेला सैटाइवा चिरचिरा
कलोंजी एमरेन्थेसी,
रैननकुलेसी पत्ती बीज
7 डाइबिटीज टेरोकारपस मारसूपियम बीजा फैबेसी कष्ठ पाउडर
8 कान का दर्द गूइजोटिया एबीसिनिका रमतिला एस्टेरेसी पŸाी का रस
9 बवासीर ब्लूमिया लैसेरा निर्मुड़ी कुकरउन्दा एस्टेरेसी पŸाी
10 सिफलिस एनोना स्क्वामोसा सीताफल एनोनेसी पŸाी, बीज
11 गोनोरिया बाॅमबैक्स सीबा
एलोय बारबाडेनसिस सेमल
घी कुंवार बाम्बाकैसी
लीलिएसी तना,
पŸाी
12 रक्तचाप रावोल्फिया सर्पेन्टिना सर्पगन्धा एपोसाइनेसी जड़
13 लैंगिक कमजोरी बाॅमबैक्स सीबा सेमल बाम्बाकैसी पुष्प
निष्कर्ष एवं सुझाव
उपरोक्त अध्ययन के फलस्वरूप 34 कुलों के 67 पुष्पीय पौधों के औषधि उपयोग के संबन्ध में बांधवगढ़ के बैगा जनजातियों से जानकारी प्राप्त की गई। सामान्य बीमारियों जैसे दर्द, बुखार, घाव सदी, दस्त, सूजन, त्वचा, रोग आदि के उपचार के लिए अनेक पौधे बैगा जनजाति द्वारा उपयोग में लाये जाते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बीमारियों के लिए कुछ ही पौधों की जानकारी इन आदिवासियों को है, जिसका वह प्रयोग करते हैं (तालिका - 1)।
महत्वपूर्ण रोगों के उपचार के लिए उपयोगी पौधे जैसे गर्भपात एवं बन्धता के लिए एब्रस प्रिकैटोरिअस (घुंघची), तपेदिक हेतु बारलेरिया प्रिओनिटिस (बज्रदंती), कुष्ठ रोग हेतु एकाइरेन्थेस एसपेरा (चिरचिरा), एवं नाइजेला सैटाइवा (कलोंजी), बवासीर हेतु ब्लूमिया लैसेरा (निर्गुन्ड़ी/कुकराउन्दा), सर्पदंश हेतु परगुलैरिया डैइमिया (दुग्धबेल), आदि है। (तालिका- 2) इनमें से बहुत से पौधे अत्याधिक उपयोग, वनों के विनाश तथा आवास स्थल के नष्ट होने के कारण अपने प्राकृतिक स्त्रोतों से धीरे-धीरे कम हो रहें हैं या समाप्त हो रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि इन पौधों का रोपण एवं संरक्षण किया जाय, जिससे जनजातियों एवंजन सामान्य को उपयोग हेतु औषधि मिल सके।
पौधे के अंगों का रासायनिक विश्लेषण करके विभिन्न अंगों का रोगो ंके प्रति दक्षता का पता लगाना, एवं किसी विशेष रोग हेतु उपयोगी अनेक पौधों में से दक्षता का तुलनात्मक अध्ययन करके जानकारी प्राप्त करना तथा उनका संरक्षण करना अन्य आवश्यक पहलू हैं।
संदर्भ
1. हर्शबरगर, जे. डब्लू (1895): सम न्यू आइडियाज। फिलाडेलफिया इविनिंग टेलीग्राफ।
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11 मिश्रा,स्कन्द कुमार (2015) इथनो मेडिसिनल प्लान्ट्स रिसोर्सेज आॅफ ट्राइब्स आॅफ विन्ध्यन रीजन आॅफ मध्यप्रदेश । रिसर्च जर्नल फार्मा. साइन्स, वाल्यूम 5(2) पेज 1-5
Received on 11.07.2017 Modified on 28.08.2017
Accepted on 12.09.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(3):145-147.